Thursday, 30 October 2014

सर्दियों का मौसम मेरे लिए होता है खास और आपके लिए ??

सर्दियों का मौसम मेरे लिए होता है खास और आपके लिए ??



सर्दियों  का मौसम आते ही मन कहीं दूर निकल जाता है। वहां जहाँ से मैं होकर आया। अपने बचपन अपने स्कूल के दिनों की वो सर्दियाँ आज भी ख़ास हैं। वो चाय की चुस्कियां वो अलाव के पास बैठकर भुनी मूंगफली के दाने खाना। वो उन दिनों आलू द पराठे वो ब्रेड मक्खन की ताजगी , वो रात में हैलोजन की रोशनी में बैडमिंटन की तड़ातड़ कितना कुछ हो जाता है कहने को जब सर्दियाँ आती हैं। ठंडी हवाएँ सब कुछ बहा ले आती हैं अपने साथ। वो बल्ला जो उठता था तब तक उठा रहता था जब तक घर से बुलावा नहीं आता था उस पर भी हम अनसुना कर देते थे। वो मेरी जर्क बाल ज़रा कालर ऊपर कर लूँ फिर लिखता हूँ।  वो संडे स्पेशल होता था आम दिनों से बिल्कुल अलग। रजाई की गरमाहट के साथ सुबह की रंगोली से लेकर शक्तिमान तक फिर शाम की दूरदर्शन की वो फिल्म खींच ले जाते हैं ये सारे लम्हे मुझे अपनी तरफ। खेलकूद और मस्ती के बीच स्कूल के लाजवाब दिन। स्कूल डेज बड़े प्यारे थे। स्कूल के वो सारे दोस्त वो टीचर सब कुछ याद है। हाँ टेबल याद करने में ज़रा लूज था हर शुक्रवार के वो श्रीवास्तव सर के डंडे सर्दियों में जब हथेली पर पड़ते थे उस पल मैं सिहर उठता था।  मगर डंडे खाना टेबल याद करने से ज्यादा आसान समझता था। टेबल याद करने के मामले ढीठ था। कड़ाके की सर्दियों में जब पारा शून्य हो जाता था छुट्टी हो जाती थी कई दिनों तक स्कूल बंद हो जाते थे मानो पंख लग जाते थे। ऐसे में ज्यादा वक़्त किताबों से दूर खेलकूद और कुछ क्रिएटिव करने में ज्यादा बीतता था। उन दिनों शतरंज का भी चस्का हुआ करता था। फिर छुट्टियां ख़त्म होते ही थोड़ा मायूस से हो जाते थे।










सर्दियों का मौसम खुशनुमा रंगीन होता था। गुनगुनी धूप सेंकना बहुत अच्छा लगता होगा आपको भी। उस पर किसी आउटडोर गेम का माहौल बन जाए तो और भी मज़ा आता है। मगर वो सेफ होना चाहिए  कोई पार्क हो पास में तो बेहतर है, नहीं है गली या सड़क सुरक्षित हों कोई नुकसान न हो तो ही खेलें। क्युकी खेलने से कहीं ज्यादा सेफ रहना जरूरी है। इसलिए खेलने के लिए जगह हमारे अनुकूल होनी चाहिए। ताकि हम खुद को तरोताज़ा रख सकें जिससे इन स्पेशल दिनों को और भी स्पेशल बनाया जा सके। अगर खेलना पसंद नहीं है, आपके आस पास अच्छे दोस्त नहीं है या फिर जगह नहीं है तो भी कोई बात नहीं, आप कुछ क्रिएटिव कर सकते हैं। नए साल पर तैयारी के लिए अपने हाथों ग्रीटिंग बना सकते हैं। पेंटिंग भी कर सकते हैं , कुछ नया कर सकते हैं या फिर कहानी कविता डायरी या जो पसंद है वो लिख सकते हैं। अपनी पसंदीदा डिश बना सकते हैं कुछ नहीं तो अपनी पसंदीदा डिश बनवा सकते हैं। अगर आपने कभी मक्के बाजरे और बेसन की रोटी नहीं खायी तो जरूर खाए। सर्दियों का स्वाद दोगुना हो जाएगा। कहीं घूमने जा सकते हैं दोस्तों के साथ फैमिली के साथ।

सर्दियों का मौसम गर्म और रंगीन कपड़ों के लिए भी बहुत खास है। स्वेटर बुनने का प्रचलन भले ही आज कम हो गया हो मगर फिर भी ये पूरी तरह से बंद नहीं हुआ। बचपन में मैं और भाई मम्मा के हाथों के बुने स्वेटर पहनते थे जिसे वो बड़ी मेहनत से बनाती थीं। हर फंदे में सर्दियों की मिठास होती थी। ऊन के फंदों को जोड़ने का ये दिलचस्प खेल भी बड़ा सुकून देता था जब मम्मा और उनकी दो-चार सहेलियां बैठकर स्वेटर बुनती थीं उनके चेहरे पर मुस्कान झलकती थी और जल्दी से जल्दी स्वेटर पूरी करने की होड़ सी लगी होती थी। आज भले ही हम खरीदे हुए स्वेटर पहनना पसंद करते हों। मगर वो बचपन की स्वेटर हमारी खास हुआ करती थी। आप सबके पास भी होगी जरूर। इन रंगीन ऊनो से आप जो चाहे वो बना लो ये भी एक हुनर है। ये नहीं करना तो कोई बात नहीं अपने पॉकेट मनी के हिसाब से गर्म कपड़ों की खरीददारी करना भी मन को ख़ुशी देता है ये इन सर्दियों में आपको कलरफुल रखेंगे।  हाँ अपने आस पास जरुरतमंदों को अपने पुराने गर्म कपड़े देंगे तो सर्दियों में उन्हें भी तकलीफ नहीं होगी उनकी सर्दियाँ भी अच्छी व्यतीत होंगी। आपको भी अच्छा लगेगा।


सर्दियों में ही शुरू होता है हम सबका चहेता नया साल। पुराना साल कुछ मीठी खट्टी यादों के साथ हम सबसे जुदा हो जाता है हमेशा के लिए और ढेर सारी यादें दे जाता है। नया साल नए उम्मीद की तरह आता है। नए साल की वो नयी सुबह स्पेशल सी होती है आज भी। कुछ खास तैयारियां हम करते हैं। मोबाइल, फेसबुक, वॉट्सऐप या मेल के जरिये भले ही हम आज शुभकामनाएं देते हों मगर वो ग्रीटिंग का सुनहरा दौर जब याद करते हैं तो उस अनोखे कार्ड की महक आज भी साँसों में घुल जाती है। बड़ी मेहनत करते थे हम उसमे ऐसे ही वो ख़ास नहीं है। बहुत सोंचकर लिखना पड़ता था। उन रंगीन कार्डों के साथ हमारे पल रंगीन हो जाते थे और सर्दियाँ गुलाबी। दिल की बातों को कार्ड पर लिखना या शेर -ओ-शायरी लिखकर किसी को भेंट करना अच्छा लगता था। नए साल को सेलीब्रेट करने का सबका तरीका अलग अलग जरूर होता है मगर ख़ुशी एक होती है। आप सबके जीवन में ये सर्दियां आलस्य दूर भगाए मौसम खुशनुमा बनाएं आप सर्दियों का भरपूर लुत्फ़ उठाये तंदरुस्त रहें और हाँ एक ग्रीटिंग जरूर बनाये अपने लिए ही सही या खरीद कर लाएं। हो सके तो महिलाये थोड़ा वक़्त निकालकर अपने बच्चों के लिए फ्रॉक ,हाइनेक ,कैप कुछ भी बनाएं। सर्दियाँ यादगार खुशनुमा हो जाएंगी। और हाँ एक बार फिर लिख रहा हूँ जरुरतमंदों को अपने पुराने गर्म कपड़े देंगे तो सर्दियों में उन्हें भी तकलीफ नहीं होगी उनकी सर्दियाँ भी अच्छी व्यतीत होंगी। आपको भी अच्छा लगेगा। जय हिन्द।  

~ प्रसनीत यादव ~
१०/३१/१४











   

Friday, 6 June 2014

बात बेबात पर/06-06-14

अब न कोई आस अधूरी होगी
न प्यास अधूरी होगी
खुदा ने चाहा इच्छा जरूर
पूरी होगी <3

~ प्रसनीत ~
०६/०२/१४

कितने ही सवालों का जवाब हूँ मैं
हूँ शोला कोई या आफ़ताब हूँ मैं
गिनती क्या करते हो मेरे वज़ूद की
तुम्हारी दुनिया में बेहिसाब हूँ मैं
तिनका ही समझो तुम्हारी मर्ज़ी
नहीं पता अच्छा या खराब हूँ मैं
जानता नहीं कुछ बस इतना पता है
तुम्हारे अँधेरे रास्तों का चिराग हूँ मैं।

~ प्रसनीत यादव ~
०६/०५/१४

हम हवाओं में पतंगों को छोड़ दिया करते हैं
नाज़ुक रिश्तों के धागों को तोड़ दिया करते हैं
गीत कभी लिखते हैं ग़ज़ल कभी कहते हैं
यूँ शब्दों से टूटे हुए को जोड़ दिया करते हैं
दिल के आशियाने में प्यार का जहाँ बना
हम रिश्तों में मिठास घोल दिया करते हैं
कोई न रह जाए तन्हा हमारी परछाई में
हम गैरों को भी बड़ा मोल दिया करते हैं
कितनी ही तलाश कर लो अधूरा रहता है कुछ
हम खुली किताब सा दिल खोल दिया करते हैं।
मीठी मीठी बातों से किसी को क्या लुभाना
जो दिल में आये साफ़ बोल दिया करते हैं।

~ प्रसनीत यादव ~
०६/०५/१४

आज कोई बहाना मत बनाओ
मुझे फिर दीवाना मत बनाओ
क्या है चाल तुम्हारी समझ आती नहीं
नज़रों का तीर न चलाओ
फितरत बदल चुकी है कई बार तुम्हारी
नीयत बदल चुकी है कई बार तुम्हारी
होंगे न घायल हम ऐसे न मुस्कुराओ
आज कोई बहाना मत बनाओ
मुझे फिर दीवाना मत बनाओ।

~ प्रसनीत यादव ~
०६/०६/१४

जब मोहब्बत की पहली किताब लिखी थी
जज़्बातों की आंधी में
जाने कितनी ही बात लिखी थी
तू समझी थी बावला मगर सुन बावली
तड़प कर मेरी रूह ने उस दिन
स्याही से अपने दिल की आवाज़ लिखी थी
कोरे पन्नो में तेरी करामात लिखी थी
मैंने एक शुरुआत लिखी थी ।

~ प्रसनीत यादव ~
०६/०६/१४



  

Sunday, 1 June 2014

06/02/14

मेरी कलम में जो ये रोशनाई न होती
हमने ये ग़ज़ल यहाँ सुनाई न होती।

करीब होकर भी कितना दूर रहे तुम
थोड़ा समझ जाते तो बेवफाई ना होती।

सात सुरों में पिरोये हमने अपने ज़ज़्बात
इनके बिना बज रही शहनाई न होती।

खुश हूँ तुमने जलाकर जो ख़ाक किया
यूँ हमने दुनिया अलग बसाई न होती।

आज तन्हाईयाँ खुद पीछे भागती हैं मेरे
शौक में यूँ ही उम्र बितायी न होती।

बात बन जाती उस दिन खूब दिलकश
जो नज़रे झुकाये तुम लजाई न होती।

तुम साथ न देते ऐतबार ही कर लेते 
तड़पाने को तुम्हे क़सम उठाई न होती।

ये सारे लफ्ज़ ज़ेहन से निकले है प्रसनीत
बिन इनके एहसासों की दिलरुबाई न होती।  

~ प्रसनीत यादव ~
०६/०२/१४

Tuesday, 27 May 2014

बात-बेबात पर /28-05-14

मेरे इस अंजाम का इल्ज़ाम तुझ पर है
दिया था तूने कभी आज वही
ईनाम तुझ पर है
अपनी पसंद बता कौन सी कलम से
लिखूं ये इबादत
बीत रहे इक इक लम्हे का
पैग़ाम तुझ पर है
ये मेरे दिल का है एक टुकड़ा सुन ले
इसकी आह क़ुर्बान तुझ पर है <3

~ प्रसनीत ~
०५/२८/१४

एक मुद्दत से लिखा नहीं कुछ
आज लिखने की तमन्ना है
गुलाब की कोमल पंखुरियों सा
बनने की तमन्ना है
मुझे है पता वो मुझ पर यकीं नहीं करते
उनका यकीं बनने की तमन्ना है
इन ठंडी हवाओं की तरह
उनके संग संग बहने की तमन्ना है
मुझे आज बड़े दिनों बाद
उन्हें सुनने की तमन्ना है <3

~ प्रसनीत ~
०५/२८/१४

चोरी चोरी साज़िश न कर
रात बहुत हो गयी
देख मुझे अच्छा नहीं लगता
नैनो से आंसुओं की
बारिश न कर
ये ज़ालिम ज़माना
इल्ज़ाम लगाएगा
जो तुझको इस सूरत-ए -हाल में
पायेगा
ये इश्क़-विश्क की बातें करके
मुझको घायल न कर <3

~ प्रसनीत ~
०५/२८/१४

तुम्हे सुनते रहें हम ऐसे लम्हे की
तलाश करें 
खुद अपने आप से ही कितनी बात करें
क्या कहें अब आप सुनते नहीं
हम ख़्वाबों में आप से कितनी
मुलाकात करें
दिल ये भरता नहीं सच है साथी
हम चाहे जितनी बात करें
रात को दिन या दिन को रात करें
तुम्हे सुनते रहें हम ऐसे लम्हे की
तलाश करें <3

~ प्रसनीत ~
०५/२८/१४

मेरी आँख नम हो गयी,
गयी जब तू दूर 
ज़िन्दगी ख़त्म हो गयी
भरी थी कितनी स्याही
इस दिल में
गिरी जब आँखों से
जमीं पे दफ़न हो गयी
क्या मांगे उस खुदा से
हम खुद से जुदा जुदा से
हैं वीरानियाँ इतनी
खुशियां जो मिली तुझसे
वो सारी कफ़न हो गयीं
गयी जब तू दूर
ज़िन्दगी खत्म हो गयी <3

~ प्रसनीत ~
०५/२८/१४ 

आज लिख जाने को दिल करता है
कितना कुछ कह जाने को दिल करता है
तुम हो न साथ इसलिए
हर एक एहसास में भीग जाने को
दिल करता है
तुम इसे मेरे अंदर की रुमानियत समझो
या कुछ और
बस ऐसे ही इसी अंदाज़ में
जी जाने को दिल करता है
दूर रहकर ऐसे ही पास आने को दिल करता है
आज लिख जाने को दिल करता है <3

~ प्रसनीत ~
०५/२८/१४ 





Monday, 26 May 2014

बात-बेबात पर /26-05-14

किसी ने कभी तो जलाया होता
हंस कर खुद हमें दर्द जताया होगा
हम भी होते लहरों से लड़ने के आदी
जो मेरा ये दिल चोट खाया होता
मुलाकात मुलाकात में किसी ने तो
हमें मिटाया होता
पलकों से गिराया होता
आज हम भी होते इश्क़ के बाज़ीगर 
जो किसी ने सताया होता
सही रास्ता दिखाया होता।

~ प्रसनीत ~
०५/२६/१४

बात-बेबात पर अपनी बात कहता हूँ
मैं भी तो किसी के दिल में रहता हूँ
हूँ किसी का अरमान
बस उससे हूँ अनजान
बात-बेबात पर बस ऐसे ही
मुलाक़ात करता हूँ
मैं भी तो किसी का इंतज़ार रहता हूँ
हूँ कोई ख्याल मगर किसका
बस मेरा ये सवाल
बात बेबात पर क्या कुछ कहता हूँ
मैं भी छोटा सा दिल रखता हूँ
हूँ किसी का लम्हा जो हूँ तन्हा
बात-बेबात पर खुद को बेकरार करता हूँ
मैं भी तो किसी से प्यार करता हूँ ।

~ प्रसनीत ~
०५/२६/१४   

Sunday, 25 May 2014

मुझे आदत मत बनाना /25-05-14

मुझे आदत मत बनाओ
मैं दरिया हूँ बहता जाऊँगा
जाने कहाँ जाऊँगा
सागर में मिल
उसकी कितनी गहराई तक
जाने किस छोर तक
मुझे आदत मत बनाओ 
मैं तिनका हूँ
जाने कहाँ उड़ जाऊँगा
हवा के एक रुख से
या पैरों तले कुचला जाऊँगा
मुझे आदत मत बनाओ
मौसम हूँ
बदलता जाऊँगा
बस पल दो पल मिलता जाऊँगा
हँसता जाऊँगा खिलता जाऊँगा
मुझे आदत बनाना
ठीक नहीं
एक अनजान मुसाफ़िर सी
फितरत मेरी
साथ चलता जाऊँगा
बिछड़ता जाऊंगा
मुझे आदत मत बनाओ
मैं एक नशा
चढ़ता जाऊँगा
उतरता जाऊंगा
देखो ये ठीक नहीं दिल का
लगाना
सोंच लो
बेचैन तुम्हे करता जाऊँगा
मुझे आदत मत बनाओ
बस इतना कर दो
डरता हूँ 
नहीं चाहता जब दूर जाऊं
तुमको आंसूं दे जाऊं
तोड़ जाऊं खिलौने सा
कहता हूँ फिर
दिल को कितना भी बहलाना
मुझे आदत मत बनाना
मैं एक पंछी हूँ
जाने कहाँ मुड़ जाऊँगा
किस झुण्ड में मिल जाऊँगा
या कहीं खो जाऊँगा
नहीं मालूम खुद
मैं किधर जाऊँगा
बीच मझधार
या फिर किसी किनारे पर।

~ प्रसनीत यादव ~
०५/२५/१४
© PRASNEET YADAV 2014


Sunday, 15 September 2013

मेरा खोया चाँद

फिर किसी और दिन आना ऐ  चाँद आज दिल नहीं लगता ,
अन्धेरा रहने दो,
उसकी रौशनी याद आएगी जो तेरी रोशनी देखी मैंने ,
फिर किसी और दिन आना दिल लगाने आज दिल नहीं लगता ,
क्या कहूँ क्या नहीं ?
दर्द मेरा किसी और को न बताना बस ,
 जाऊं कहाँ यहीं रहने दो आज ,
 जाओ चले आये जहां  तुम ,
अकेला रहना मुझे
खिला करती थी मेरे होंठों पर मुस्कान ,
मुस्कुराने में आज दिल नहीं लगता ,
चाँद हो तुम दुनिया तुम्हे जाने ,
कितने आशिकों की तुम पहचान
क्या तुम्हे पता नहीं किस कदर टूटे मेरे अरमान ,
किया करता था तुमसे अपने चाँद की तुलना ,
तुम्हारी  चाँदनी में बैठकर ,
किया करता था कितनी सारी बातें ,
है कोई हिसाब बताओ ज़रा गुज़री कितनी रातें ,
क्या जानो तुम मेरी बेबसी ,
क्या जानो तुम मेरे उस चाँद के खो जाने का गम ,
जब वो चाँद नहीं ,
अन्धेरा  ही रहने दो फिर किसी और दिन आना ,
उस चाँद के बिना तुम भी अधूरे ,
उसके बिना आज दिल नहीं लगता।

~ प्रसनीत यादव ~

© PRASNEET YADAV










दोस्ती के नाम

आँखों में थोड़ी सी नमी छोड़ जायेंगे ,
जीवन में थोड़ी सी कमी छोड़ जायेंगे ,
जायेंगे जब यार तुमसे  दूर ,
हम एक प्यारी हंसी छोड़ जायेंगे ,
बसोगे जहाँ  तुम दुनिया के जिस कोने में ,
याद करना दिल से हम दौड़े आयेंगे ,
सागर के मौजों के जैसा वक़्त भी तो है
सागर के मौजों के जैसा वक़्त भी तो है ,
हम  हर पल  को अपना कर जायेंगे ,
ऐ दोस्त तुम्हारी कमी खलेगी बहुत
ऐ  दोस्त तुम्हारी कमी खलेगी बहुत,
जब  साथ न रहोगे तुम ,
तब हम तुम्हारे साथ जिए एहसास से ही
ज़िन्दगी बिताएंगे
जैसे भरते आये रंग आज तक
जैसे भरते आये रंग आज तक
कोरे पन्नो में तब भी बनाकर चित्र नए
रंग भर जायेंगे ,
ऐ  दोस्त ऐसे ही तुम्हे बस ऐसे ही प्यार कर जायेंगे।

~ प्रसनीत यादव ~

© PRASNEET YADAV


Saturday, 11 May 2013

Happy Mothers Day :) ~ 12/052013 ~

"मम्मा" किसी काम से बाहर गयी थी, मेरे Exams आने वाले थे पहली बार 4Rth Standard में मुझे उनसे दूर होना पड़ा, रो रोकर मेरा बुरा हाल था, माचिस की जली हुई तीलियों से मैंने किचेन की दीवाल पर एक ही शब्द लिख रखा था। "माँ" "माँ " "माँ" मेरे उस शब्द का शायद ही कोई मतलब समझ पाया हो की मैंने वो क्यों लिखा है। हर कोई तो था मेरे साथ। दादी पिता जी, भाई। सिर्फ कुछ दिनों तक "मम्मा" मुझसे दूर थी। बहुत कठोर थे वो दिन। आज जब मै कंप्यूटर पर Work करता हूँ मुझे देर होती है तो "मम्मा" कहती है - "लड़के क्यों अपनी सेहत खराब कर रहा है, वक़्त पर खाना तो खा लिया कर" ईमानदारी से कहूँ मै उस वक़्त उनकी बात अनसुनी करता हूँ । मगर फिर एहसास होता है मेरा मन मुझसे बातें करता है और कहता है - मै गलत हूँ ठीक ही तो कहती है वो, अगर आज नहीं सीखूंगा तो कब सीखूंगा। कहीं बाहर जाता हूँ मुझे वक़्त पर खाना नहीं मिलता तो सिर्फ उनकी ही याद आती है।
दोस्तों हम कहीं भी रहें माँ से दूर माँ के पास। हमें फिक्र हो न हो माँ हर वक़्त हमारी फिक्र में रहती है।
खैर मै जो करता हूँ करना चाहता हूँ। सिर्फ अपने लिए नहीं, उसमे उनको भी ख़ुशी होगी। जानता हूँ मुझे कैसे कब क्या करना है ?
कोशिश करूँगा उन्हें शिकायत का मौक़ा फिर न दूँ। और वो खुशियाँ जिनका आभाव है ज़िन्दगी में एक-एक करके उन्हें लाकर दे सकूँ।

आप सभी को Happy Mothers Day :)
कुछ पंक्तियाँ "माँ" के लिए .... जो उसके प्रेम और त्याग के आगे बहुत छोटी है ....    


असर देखना है देख ले,
उसकी दुआओं का फल देख ले,
दुनिया में होंगे बहुत से आलीशान
महल तो क्या ?
तू उसकी ममता का बसर देख ले,
मिला है जो नसीब से वो माँ का प्यार,
उससे जीत सकता है दुनिया को जीत ले,
झोली भर नहीं सकता उसकी आखरी सांस तक,
वो मंदिर वो मस्जिद वो गीता वो कुरान,
वो शाह-ए-मदीना वो चारो धाम,
वो निस्वार्थ प्रेम की गंगा एक ,
बिगड़ा नहीं अभी भी कुछ ,
तू उससे कुछ तो सिख ले
ला सकता है तो ले आ, "माँ" के चरणों में
ये आसमान तक ,
तू "माँ" का लाल ....ले चल हाँथ थामे सबको,
दुनिया को नयी सिख दे ,
क़यामत कितनी भी आये,
युग युग बदल जाएँ,
ये प्यार नहीं बदल सकता ,
माँ का ममता रूपी संसार नहीं बदल सकता,
देखे होंगे बहुत से शहर तो क्या ?
तू उसके दिल का भी एक शहर देख ले,
फिक्र में बच्चों के बूढ़ी हो जाती है वो "माँ"
तू उसको एक नज़र देख ले,
कौन कहता है वो मांगती है तुझसे सोना चांदी,
बस उसे न कभी तकलीफ दे,
उसे भी प्यार दे,
अपनी ज़िन्दगी उस पर भी वार दे,
खुश होगी वो लाख दुआओं से झोली भरेगी तेरी,
मज़े लूटे होंगे तूने बड़े शौक से कई सारे तो क्या ?
तू ममता की जन्नत का मज़ा भी देख ले,
वो जिसमे तेरा नुक्सान नहीं होगा,
जीना हराम नहीं होगा,
तू उस रिश्ते की एक झलक देख ले ....:))*

~ प्रसनीत यादव ~








Wednesday, 8 May 2013

Me & Cinema 09/05/2013

~  सिनेमा से मेरी पहली मुलाकात  09/05/2013 ~

वक़्त था शाम के शो का तब मै बहुत छोटा था पूरी फिल्म तो याद नहीं हाँ २-४ seen और एक गाना याद  है,  उस समय कुछ नहीं मालूम था बालकनी क्या है ? first n Family क्या है, और तो मुझे ये भी नहीं पता था कहाँ था मै ? सिनेमा हाल जैसी भी चीज़ होती है और जिसे मै देख रहा उसे फिल्म कहते है। शो कब शुरू हुआ कब ख़त्म पता न चल सका। हाँ ये जरूर पता है मैंने सिर्फ आधा पौन घंटा ही फिल्म देखि होगी बाकी Time जम्हाई ले लेकर नींदे मारता रहा। कानपुर के किसी सिनेमा हाल की बात है ये। जहाँ पहली बार मैंने एक फिल्म देखि।
माँ , पिताजी छोटे भाई के साथ। संजय दत्त, सलमान खान और माधुरी दिक्षित  जैसे सितारों से सजी ये फिल्म थी "साजन" इस फिल्म के सारे गाने एवर ग्रीन हैं। लेकिन इसका एक गाना उस दिन पहली बार मैंने सुना। बचपन का वो एहसास आज भी ज़िंदा है। उस दिन की हल्की सी झलक जो छाप सिनेमा की मेरे दिल में बस गयी ये गाना उसी का एक अंश है "तू शायर है मै तेरी शायरी"
ये फिल्म मुझे पसंद है पहले जैसी तब से इसे न जाने कितनी बार देख चुका हूँ मगर उस दिन सिनेमा से मेरी पहली मुलाकात की बात ही कुछ और थी। Dedicate करता हूँ इस फिल्म का एक गाना आप सबको जो मेरे दिल  के बहुत करीब है अनुराधा पौडवाल की मीठी सी आवाज़ में "बहुत प्यार करते है तुमको सनम" ।  I  Always Miss My 90's । सिनेमा के साथ जुड़े मेरे अपने किस्से आगे भी शुरू रहेंगे। सिनेमा के १०० वर्षों के जश्न में इतना तो बनता ही है :)

TO BE CONTINUED....

http://www.youtube.com/watch?v=KdtlfPMbKGs&feature=player_detailpage


~ 11/05/2013 ~

बात ८० के दशक की हो और ये गाना जुबान पर ना आये ऐसा कैसे हो सकता है। बिग बी और ऋषी कपूर पर फिल्माया गया ये गाना ८० के दशक के गीत संगीत फ़िल्मी विधा और उस वक़्त के सिनेमाई मिर्च मशाले का एक बेजोड़ नमूना है। उस पर बिग बी और ऋषी कपूर की अदाकारी के कहने ही क्या जो इस गाने पर चार चाँद लगा गए। ८० के दशक के शुरुआत में Year १९८१ फिल्म "नसीब" का यह गाना जितना सुनने में अच्छा लगता है उससे कहीं ज्यादा देखने में भी। इस गाने को देखकर मुझे अपने Friend Ritu Raj की याद ज़रूर आती है, सोचता हूँ नसीब २ बनाऊं और यह गाना फिर से नए तरीके से फिल्माऊ। और उस गाने में Ritu Raj को ज़रूर शामिल करूँ। आइये लौट कर चलते है फ़्लैश बैक में जब यह फिल्म बनायी गयी। इस गाने को सुनकर उस वक़्त को महसूस करते है। उस वक़्त को जीते है। थोड़ा सा झूमते है। मै तो चला Ritu Raj को मनाने आप एंजॉय करिए रफ़ी साहब, बिग बी की और ऋषी कपूर के इस Combination को ....

From Movie - Naseeb (1981 )

SonG - "ChaL Mere Bhai" ( Its An Ideal Song for Sibling Affection And Care )

Playback -Amitabh Bachchan, Moh. Rafi

Music -Laxmikant Pyarelal

http://www.youtube.com/watch?v=GWcFRGSXcZA&feature=player_detailpage








Monday, 6 May 2013

07/May/2013

3 मई १९१३ दादा साहब फाल्के की अगुवाई में आगाज़ हुआ हिन्दुस्तानी सिनेमा का। ३ मई २०१३ अब हम पुरे १०० वर्षों का सफ़र तय कर चुके है। राजा हरिश्चन्द्र से अब तक फिल्मो का हिसाब लगा पाना मुश्किल है, हमने हर दौर को जिया है ५०, ६०, ७०, ८०, ९० हर दौर कुछ कहता है अपने अपने वक़्त में ढला हुआ। हर दौर का फिल्मांकन, कहानी, गीत-संगीत हमें आज भी अपने-अपने दशक के उसी पुराने दौर में ले जाता है, हमने सिनेमा का इतिहास रचा है।

शोले, मुगले आज़म, आवारा, मदर इंडिया, ऐसे और भी कई नाम है जो दिलों की स्क्रीन पर छाये हुए है, जिससे सिनेमाई परदे आज भी शान से चमक रहे है। जिनकी बुनियाद पर पूरा बालीवुड खड़ा है। दशक कोई भी रहा हो कुछ देकर कुछ कहकर गया। चुनिन्दा सितारे और कभी जेहन से न मिटने वाली कुछ चुनिन्दा फिल्में।

आज हमारे पास १०० साल का बालीवुड है। दादा साहब फाल्के की खास पहल ने आज  एक ऐसी इंडस्ट्री खड़ी की है जिसकी नीव मज़बूत है और उस पर खड़ा है आलिशान महल रूपी बालीवुड का भविष्य .... हमारे पास है एक ऐसी धरोहर जो पुराने लोग हमें देकर गए। दौलत शोहरत, सपनो से ओत-प्रोत नाम और मेहनत  का बालीवुड। कभी DDLJ के रंग में , कभी KKHH के रंग में, कभी Munna Bhai, कभी Three Idiots और भी कई कामयाब फिल्मो से रंगा ये बालीवुड। आइये १०० वर्षों का सफ़र पूरा कर चुके बालीवुड के साथ उसके उत्सव में हम सब शामिल हों।

~ प्रस्नीत  यादव ~
      


                

Friday, 15 February 2013

~ Happy Valentines Day Forever ~

Raat Gahri Ho Chali Hai ....,
Shayad Fir Se Kuch Kahne
Chali Hai,
Karwaten Badalte Bistar Par
Intzaar Kisi Ka Karti,
Ye Raat Begaani Nahi
Ye Raat Apni Ho Chali Hai ,
Sitaaron Sa Sajaa Asmaan
Ye Raat Saj Uthi Hai,
Aisa Lagta Hai Aashiqi Ki Baraat
Saare Jahan Me Aayi,
Deewali Sa Samaa hai
Bahar Kahin ,
Dekho Jara Ye Raat Roshan Ho
Uthi Hai....
Mujhe Pata Hai Mujhe Khabar Hai
Koi Aayega nahi Baat Karne ,
Mai Baat Kiye Ja Raha....,
Ye Mai Nahi Ye Raat kah
Rahi Hai,
Raat Jaise Beet Rahi Ek Junu Liye ....,
 Kisi Me Kho Chali Hai ,
Kisi Ki Ho Chali Hai ....:))*



Wednesday, 13 February 2013

14/February/2013

आज जहाँ को रोशन कर दो ,
और प्यार में नहला दो ,
छू छू कर आकाश  के तारे सारे ,
उन्हें जमी पर बिखरा दो ,
इस दीवानी आज सुबह  को ,
इस दीवानी आज शाम को ,
रात को ....,
और दीवाना सा कर दो ,
दो जहाँ को मिलने दो ,
बंद कलि  होठों की आज जरा
खिलने दो ,
आज जहाँ को प्यारा कर दो ,
खिल खिल कर खूब महकने दो ,
इस दीवानी आज सुबह को ,
इस दीवानी आज शाम को ,
रात को ....,
खूब जरा चहकने दो ,
जवां हो चले प्यार जहाँ
वहां नज़र न लगने दो ,
मत रोको ये सैलाब,
लगती है जो आग लगने दो ,
आज जहाँ को सावन कर दो ,
झूम झूम बरसने दो ,
बदले न आगाज़ कुछ ऐसा हो विश्वास ,
बहा दो प्यार की गंगा ,
आज जहाँ को निर्मल कर दो ,
पावन कर दो ....:))*

~ Happy Valentine Day Forever ~

~ Prasneet Yadav ~

Friday, 1 February 2013

~ Jab Mile Nahi Alfaaz Kabhi ~

जब मिले नहीं अल्फ़ाज़ कभी,
तड़प तड़प के रह जाऊँ,
सूनेपन के आलम मे ,
जाने क्या क्या कह जाऊँ,
ये लिख डाला किसके लिए ,
क्या मतलब है क्या है बात ?
खुद को कैसे मै समझाऊँ,
कुछ समझो तुम तो समझा देना,
खता हुई जो बतला देना,
मै अनजान मुसाफिर बस ऐसे ही
चलता जाऊँ,
करता जाऊँ खुद से ना जाने
कितनी बातें,
बात बात पर नए तराने....,
गीत कोई बनाऊँ,
जब नहीं मिले अल्फ़ाज़ कोई,
सिसक सिसक के रह जाऊँ,
रो रो कर....,
चलते हांथ मगर,
दिल का दर्द मै फरमाऊँ,
कभी डरूँ इस दुनिया से
और कभी न घबराऊँ,
तोड़ उम्र के सारे बंधन ,
मै सूली पर चढ़ जाऊँ,
फैलूँ कभी रोशनी बन,
जब मिले नहीं अल्फ़ाज़ कभी ,
सिमट सिमट के रह जाऊँ,
बस होता है वो पन्ना एक
जिसमे दिल को लिख जाऊँ,
बात है मेरी नज़र तुम्हारी ,
तुम सबसे वो पढ़वाऊँ,
यही है मेरी दुनिया एक ,
जब मिले नहीं अल्फ़ाज़ कभी,
जाने क्या क्या कह जाऊँ,
मै तड़प तड़प के रह जाऊँ ....:))*

~ Prasneet Yadav ~

~ 1/ Feb / 2013 ~

खूबसूरत फूलों की खुशबू की तरह
तन-मन महक उठे,
हर सुबह तुम्हें जगाए....,
सपनों का घर अपनों का घर,
खुशियों से चहक उठे,
मन खामोश न हो कभी....,
दूर दूर तक वहाँ जहां तक
कोई न जाता हो,
जाने को वहाँ ये मन बहक उठे,
मुलाकातें तो चंद रोज की
होती रहेंगी,
फूलों की ये बहार याद आए
बार बार,
दिल मे तेरे मेरे उसके प्यार की
कसक उठे,
जिसके लिए ये दिल सिसक उठे,
अच्छा चलो हंसो तो सही,
अभी भी सोये हो अलसाए हुए
जिस ख्वाब मे उठो तो सही,
देखो ओष की बूंदें कहाँ गयी ?
मिलने आया फिर कोई तुमसे
सूरज बन....,
रखो कदम सफर पर चलो तो सही,
मेरे दोस्त मेरे हम दम ....,
एक उजाला लिए ये नया दिन,
भूल सारे गिले साथ इसके
शुरुआत करो तो सही ,
की खूबसूरत इन फूलों की तरह
तन मन खिल उठे,
बिछड़ा कोई हमसे शायद
इस राह मे मिल उठे,
रोना तो बस रोना ही है....,
ये ज़िंदगी हसने का नाम है,
फैलो फिर से चमक उठो जियो तो सही ....:))*

~ Love With Prasneet ~



Friday, 25 January 2013

~ Dedicated To ALL Of u Keep SmiLinG ~

रहोगे तुम रहेंगे हम ये दिन न रहेंगे,
आओ कुछ लिख दूँ तुम सबके लिए
प्यारे से मौसम इस दिन के लिए,
जिसमे हो नाम जुड़ा हम सबकी मोहब्बत का,
आओ कुछ लिख दूँ तुम सबके लिए....
ये झगड़े ये तकरार ये भी तो है प्यार ,
दिल से मिला लो दिल कब किसको है इन्कार,
जो रहते है खामोश जो करते है बदमाशी,
वो भी जीते है हम सबके लिए ,
आओ कुछ लिख दूँ तुम सबके लिए,
प्यारे से मौसम इस दिन के लिए ....
मिट्टी के नहीं है घर ये घर है सपनों के ,
कोई रहता नहीं है एक ये घर है अपनों के,
जीना सीखो अपनों के लिए....,
आँखों मे पलते सपनों के लिए ,
आओ कुछ लिख दूँ तुम सबके लिए ....
जब न रहेंगे हम तब रात क्या होगी ?
जब न रहोगे तुम तब बात क्या होगी ?
बोलोगे फिर तुम बोलेंगे फिर हम किसके लिए
आओ कुछ लिख दूँ तुम सबके लिए....
मीठा सा संगीत संग बनाकर जाना है,
होता है जो दुनिया मे उसे मिटाकर जाना है,
हम चलें तुम चलो तुम चलो हम चलें ,
लिखूँगा मै गीत तुम सबके लिए ....:))*

~ Prasneet Yadav ~









Tuesday, 15 January 2013

~ जाने किस गली ~

जाने किस गली घूमता मन जाने किसे ढूँढता मन,
यादों के बचपन मे फिर करने चला शरारत,
जाने किस बिछड़े मीत का पता पूंछता मन,
जाने कौन सी हरकत करना चाहे,
आज फिर कोई खेल खेलना चाहे,
आम की डाली पर यादों के सुहाने झूले झूलता मन,
आज फिर झूमता मन मदमस्त अपनी मस्ती मे,
बहती नाव मे बैठ साथियों के संग,
आज पुराने तरानो को फिर छेड़ता मन,
निकाल तनहाई से बाहर भीड़ मे शामिल हो पंख फैलाये,
मोर की तरह नाचता मन,
जाने किस डगर झाँकता मन किसे ताकता मन,
मेरी खुशियों के खातिर दूर बहुत दूर भागता मन,
 जाने किस गली....:))*

~ Prasneet Yadav ~


Monday, 24 December 2012

~ Merry Christmas ~

आलस्य में जकड़े हुए खिड़की से बाहर देखते है तो पाते है। प्रकृति  सफ़ेद चादर से ढकी हुई है पेड़ फूल पत्ती सबमे नया शृंगार है नया आकर्षण, हिम की फुहारें बरस रही है। खिडकियों के शीशे जो पूरी तरह भीगे हुए है। उन्हें खोलते ही मंद ठंडी हवा का झोंका हमें स्पर्श कर रहा है। कुछ नयापन सा घुल गया है चारो तरफ। हमें इंतज़ार है उस पल का जब कोई आकर तोहफे दे और कहे 'मेर्री क्रिसमस'। हम इन फुहारों के बीच खेलें भीगे, अपने अन्दर  उत्साह भरकर बर्फ की ठंडी ठंडी राहों पर कदम रखें, वाइट क्रिसमस का मज़ा लें, ख़ुशी  से झूमते हुए संता क्लाज़ के दिए तोहफे के संग जिंगल बेल जिंगल बेल गाते रहें। एक जुट होकर क्रिसमस यानि बड़े दिन का सबक लें। एक दुसरे के लिए प्रार्थना करें एक दुसरे का सम्मान करें। साथ ही साथ यह भी प्रार्थना करें आने वाले साल हमारा समाज अपराध मुक्त हो , प्रेम का प्रकाश फैले। ईशु ने कहा था प्रकाश हर घर में हो कोई भी घर उससे वंचित न रह जाए। दिल बड़ा हो तभी हम सही अर्थों में किसी का सम्मान किसी से प्रेम करेंगे।

मेरे सभी मित्रों को इस दिन की ढेर सारी शुभकामनाओ सहित सफलता सुख चैन आपके जीवन में व्याप्त हो ज़िन्दगी ऐसे ही चलती रहे। ~ Merry Christmas ~

~ Prasneet Yadav ~






Saturday, 8 December 2012

FamiLy Sunday Have A FuN Day :) )


हफ्ते भर की भागदौड़ , स्कूल ,कॉलेज, जॉब इन सब से दूर आता है सन्डे , फैमिली के साथ कुछ पल बिताने , टीवी पर अपने पसंद की कोई मूवी दिखाने या मनपसंद गाने सुनाने वो जो बचपन की यादों से जुड़ी है उन यादों को जिन्दा करने, आप देल्ही रहो या मुंबई सन्डे सबके लिए  ख़ास है, गाँव में रहो या शहर में  जेहन में सबके अपना अपना सन्डे बसा हुआ है , वो जिनकी जॉब सन्डे को भी होती है वो भी अपना सन्डे मिस करते है, सुबह बेफिक्र होकर अलसाये हुए से बिस्तर पर पड़े रहना यूँ तो कुछ की रोज की आदत है लेकिन सन्डे के दिन इसका अपना अलग ही मज़ा है , अलार्म क्लॉक की बजती हुई रिंग जब हमारी नींद में खलल डालती है , बार बार हम उसे बंद करते है , और आलस्य में जकड़े हुए नर्म गर्म बिस्तर में फिर से दुबक जाते है , सुबह शुरू करने  का अंदाज़ सबका अलग है कोई उठते ही चाय की चुस्कियां लेता है कोई आँख मलते हुए न्यूज़ पेपर के फ्रंट  पन्ने पर नज़र  डालता है , ये सन्डे आता है प्यार लेकर वो प्यार जो आपको हफ्ते भर  नहीं मिलता, अपनों का प्यार ,  हफ्ते बाद  ढंग से घर का खाना , माँ के हाँथ का पत्नी के हाँथ का या फिर बहेन के हाँथ का, अच्छा लगता है , मन जो  परेशान होता सारी टेंशन कुछ पल के लिए दूर हो जाती है , यूँ तो हर दिन खास है मै ये नहीं कहता सन्डे बहुत खास है , फिर भी अपनों के बीच रहने का अपनी ज़िन्दगी में शामिल होने का ये छुट्टी का दिन जो मौका लेकर आता है वो पल बहुत खास है , आप सबका दिन अच्छा हो पुरानी कुछ यादें ताज़ा हों जिससे आपके होंठों पर मुस्कान खिल सके ….:))*

~ Prasneet Yadav ~